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Yuvaan Yadav@yuvaanyadav3012
सज्जा-घरक दर्पण में हमार आँखि जेना—चौकस चमकैत अछि, मुदा भीतर तऽ अचरज; नेड़ाइ तऽ छै, किछु बुझाए देनाइ—ई आश्चर्य जे हमरा धीरे-धीरे थका देतै। अंत में बूझैत छी: जवानी नहि, बस मिथकक प्रकाश बुझलाक बाद बुझैत अछि कि हम छैक—और समय छूटि गेल।

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