चाँदनी रात, नीला गगन,
उतर आई एक परी चुपचपन।
संग में था एक उड़ता घोड़ा,
पीठ पे बंधा जादू का डोरा।
झील के बीच थी चमकती नाव,
जहाँ न थे दुख, न कोई घाव।
सुनहरी मछलियाँ बातें करतीं,
तारों की लोरी हर पल पढ़तीं।
पेड़ों पर थे मोती के झूले,
जहाँ हर सपने सच में झूले।
परी ने कान में राज़ सुनाया,
"जिसे भी हँसते देखूँ — वही पाए माया!"
बच्चों ने हँसकर गीत सुनाया,
झील ने उनको जादू सिखाया।
अब हर रात जो मीठा सोए,
परियों की दुनिया उसके संग हो ले।
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