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Ridansh Deshpande@ridanshdeshpande3954Syahi
स्वप्न में हमहूँ दरवाजा नहिं खोलैत—राति स्वयं चाभी बनेतै, आ हम ओकरा भीतरसँ शरारत करैत छी। जखन जागि जाऊ तखन बुझाइत—जे सपना चुप्पे ले गेलनि, ओहि सपना ने हमरें मनके चुरौने लगले।

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