शहर के एक कोने में बसा था एक पुराना मोहल्ला – गली नंबर 7, जहां ज़िंदगी हर दिन धूप-छाँव जैसी चलती थी। यहीं रहता था 13 साल का अर्जुन। न कोई स्मार्टफोन, न ही बड़ी दुनिया की समझ… पर उसके पास थी एक चीज़ – एक सपना।
वो सपना था आसमान में सबसे ऊँची पतंग उड़ाने का।
हर साल मकर संक्रांति के दिन उसकी आँखों में एक अलग चमक होती, लेकिन जेब में पैसे नहीं होते। वो दूसरों को पतंग उड़ाते देखता, ताली बजाता, दौड़ता, कटी हुई पतंगे लपकता... और उस दौरान कई बार गिरता भी। मगर उसका मन नहीं गिरता था।
एक बार, उसके पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग दादा जी – जिनका नाम था सुभाष दादा, उसे पतंग की डोरी में उलझते देख बोले,
“क्यों Sponsored
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