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Priya Ranjan@ranjanpriyal
एक समय की बात है, जब देवताओं और असुरों (दानवों) के बीच समुद्र मंथन हुआ। उद्देश्य था—समुद्र के भीतर छिपे 'अमृत' को प्राप्त करना ताकि अमरता मिल सके। मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया।मंथन के दौरान अमृत निकलने से पहले एक अत्यंत विनाशकारी विष निकला, जिसे 'हलाहल' कहा गया। यह विष इतना घातक था कि उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। देवता और दानव दोनों ही डर गए, क्योंकि कोई भी उस विष को छूने का साहस नहीं कर सका।एक समय की बात है, जब देवताओं और असुरों (दानवों) के बीच समुद्र मंथन हुआ।उद्देश्य था—समुद्र के भीतर छिपे 'अमृत' को प्राप्त करना ताकि अमरता मिल सके।मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया।मंथन के दौरान अमृत निकलने से पहले एक अत्यंत विनाशकारी विष निकला, जिसे 'हलाहल' कहा गया।यह विष इतना घातक था कि उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे।देवता और दानव दोनों ही डर गए, क्योंकि कोई भी उस विषSponsored
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