K
Karan Acharya@karanacharya2873
पुरानी रेत के ढेर पर मैं आज भी लौटता हूँ—क्योंकि वहाँ हवा तुम्हारे नाम की तरह ठंडी लगती थी।
अब वही हवा हाथ खाली करके गुजरती है, और यादें अपने ही वजन से चुभने लगती हैं।Related
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पुरानी रेत के ढेर पर मैं आज भी लौटता हूँ—क्योंकि वहाँ हवा तुम्हारे नाम की तरह ठंडी लगती थी।
अब वही हवा हाथ खाली करके गुजरती है, और यादें अपने ही वजन से चुभने लगती हैं।No comments yet.