S
Samrath Bhosle@bhoslesamrat
इतिहासकार आर्यन मेहता शहर छोड़कर बसता है—और उसके साथ नित्या, संध्या, और कुछ परिजन। दूर, पहाड़ियों के बीच खड़ी होती है चंद्रगढ़ हवेली—सदियों पुरानी, राजसी शान से भरी, विशाल झूमरों की चमक और नक्काशीदार स्तंभों की खामोशी लिए।
नित्या के लिए यह महज़ घर नहीं, एक सपना है। “वाह… ऐसा लग रहा है जैसे हम किसी महल में आ गए हों।”
आर्यन मुस्कुराता है—“अब यही हमारा नया घर है।”
पर परिवार जब अपने-अपने कमरों में बसता है, तब हवेली की असली कहानी शेष रहती है।
सुबह आर्यन काम पर चला जाता है। दिन भर सब कुछ सामान्य—इतना सामान्य कि डर भी छुप जाए। पर शाम उतरते ही नित्या अकेले हवेली के अंदर घूमने निकल पड़ती है। पुराने कमरे, पुरानी किताबें, दीवारों पर वर्षों पुराने चित्र… और हर कदम के साथ उसे लगता है कि कोई देख रहा है—बस आवाज़ नहीं आती।
वह एक कॉरिडोर की ओर बढ़ती है। वहां धूल भरी अलमारी के पास हवा का रुख अचानक बदल जाता है… और उसे पहली बार समझ आता है कि चंद्रगढ़ हवेली भव्य जरूर है, लेकिन शांत नहीं।Sponsored
Related
View allComments
No comments yet.