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Anmol Seth@anmolseth7303
एतना भले सिंगार नहि कि हम ठहरि जायब—हम आवैत छी, आ सगरी रौनक अपने-अपने ठाम पाँजै। दर्पण कहैत अछि: “सुनहरी छबि बनि गेलहुँ।” हम जवाब दैत छी: “नहि… हम चमक अछि, बनाव नहि।”

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